हजारों लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करने वाले पद्मश्री मोहम्मद शरीफ इलाज के लिए मोहताज

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अयोध्या। फैजाबाद के 83 वर्षीय मोहम्मद शरीफ को पूरा देश जानता है। जाने भी क्यों ना उन्होंने ऐसा काम किया है जिसकी कोई मिसाल नहीं। वह अब तक 25,000 से ज्यादा लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं।

एक साल पहले तक उन्हें कोई नहीं जानता था, लेकिन पद्म अवॉर्ड मिलने के बाद उनके अच्छे काम हर किसी तरह पहुंचे।

दो कमरे वाले किराए के घर में रहने वाले मोहम्मद शरीफ बेड पर हैं। वह बहुत बीमार हैं।

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हैरानी वाली बात यह है कि उन्हे जो पद्म अवॉर्ड दिया गया था वह आज तक उन्हें नहीं मिला है।

गणतंत्र दिवस पर पद्म पुरस्कार से सम्मानित किए जाने के एक साल से भी अधिक समय हो गया और शरीफ चाचा को न तो पदक मिला और न ही प्रशस्ति पत्र।

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उनके परिवार का कहना है कि वह पदक की एक झलक पाने को तरस रहे हैं और कहीं वह यह तमन्ना लेकर इस दुनिया से न चले जाएं।

उनके परिवार के पास इतने रुपये भी नहीं हैं कि उनका इलाज करा सकें या उनके लिए दवाइयां खरीद सकें।

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अयोध्या के मोहल्ला खिरकी अली बेग में रहने वाले मोहम्मद शरीफ को लोग शरीफ चचा बुलाते हैं। वह बेसुध बिस्तर पर पड़े रहते हैं।

उन्हें तो यह भी याद नहीं है कि वह लावारिस लावारिस शवों को अपने कंधे पर लादकर मीलों पैदल चलते थे और उन्हें कब्रिस्तान में ले जाकर दफनाते थे।

उन्हें यह भी याद नहीं है कि उन्हें पिछले साल पद्म अवॉर्ड देने की घोषणा की थी। शरीफ चचा साइकल मरम्मत की दुकान चलाते थे, जो एक टिन शेड की नीचे थे। वह अब बंद पड़ी है।

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वह स्थानीय वक्फ मेंबर के घर पर किराए पर रहते हैं। उनकी 15 वर्षीय पोती, आयशा ने बताया कि उनका लीवर और किडनी खराब हो गए हैं।

76 वर्षीय की पत्नी बिब्बी ने कहा, ‘हमारे ऊपर बहुत कर्ज हो गया है। स्थानीय साहूकार और दवा दुकानदार का हजारों रुपये बकाया है। मेरे पति को अभी तक पद्म अवॉर्ड प्राप्त नहीं हुआ है, क्योंकि पुरस्कार समारोह को कोरोना महामारी और लॉकडाउन के कारण स्थगित कर दिया गया था।’

उधार लेकर बुक की थी ट्रेन की टिकट लेकिन….
एक अखबार से बात करते हुए, उनके बेटे, मोहम्मद सगीर ने कहा, ‘पिछले साल 31 जनवरी को, हमें केंद्रीय गृह मंत्रालय से एक पत्र मिला, जिसमें हमें पद्मश्री के बारे में सूचित किया गया था, मैंने अपने पिता को शुभकामना दी थी।

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जब हमें दिल्ली से फोन आया तो हमें राष्ट्रपति भवन से पुरस्कार प्राप्त करने का अनुरोध किया गया। मेरे पिता ने स्थानीय सूदखोर से 2,500 रुपये उधार लिए और ट्रेन टिकट बुक की।

अंतिम समय में हमें महामारी के कारण इस कार्यक्रम के रद्द होने की सूचना मिली। हमने ट्रेन की टिकट के जो रुपये लिए थे वह भी वापस नहीं कर पाए हैं।’

सगीर पेशे से ड्राइवर हैं और किसी तरह घरवालों के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल होता है।

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